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    मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

    विवाह एक ऐसा भी

    Publish date : 10-02-2009
    आम तौर पर विवाह को लेकर बिहार की चर्चा बाल विवाह, जबरन विवाह और दहेज प्रताडना को लेकर की जाती रही है पर बहुत कम लोगों को यह मालूम होगा कि बिहार में एक ऐसा भी समाज है जिनके बच्‍चों की शादियां बिना लेन देन और दहेज की रकम की होती हे' खास बात यह कि विवाह तय भी अभिभावक ही करते हैं और इसमें दुल्‍हा दुल्‍हन की कोइ भूमिका नहीं होती' दुल्‍हा और दुल्‍हन आइएएस अधिकारी हों यी कारपोरेट सेक्‍टर में कार्यरत हों या फिर ‍य प्राईवेट नौकरियां कर रहे उनकी शादियों में तिलक-दहेज जैसे कुरितियां नहीं होती है। पंजी प्रथा के तहत होने वाली इन शादियों में वर वघु के बीच ख्‍ुन का रिश्‍ता नहीं यही प्रमुख शर्त होती है। वर कितना भी आघ्‍ुनिक क्‍यों नहीं हो उसे विवाह के लिए पारंपरिक धोती कुर्ता पहनकर ही जाना होता है। खास बात यह कि विवाह के बाद वर को दुलहन के घर कम से कम चार रातें बितानी होती है। चतुर्र्थी नाम के एक रस्‍म को पूरा करने के बाद ही वर अपने घ्‍ार जाने की अतुमति मिलती है। इसके बाद ही लडकी की विदायी होती है। विवाह के पूर्व सिद्यांत नाम का रस्म पूरा किया जाता है। इसमें लडके लडकी की मौजूदगी के बिना ही दोनो ंपक्ष्‍ा के लोग एक दैव स्‍थ्‍ल पर एकत्र होते हैं। पंजीकार जिन्‍हें पंजी प्रथा की जानकारी होती उनसे उपस्थ्ति लोग पंजी प्रथा के तहत विवाह के अधिकार होने की बात पूछते हैं। पंजीकार की स्‍वीकारोक्ति के बाद दोनों उपस्थ्त समाज के बीच लडके लडकी की विवाह तय कर दी जाती है. इसके बाद दोनों पक्षों से एक एक व्‍यक्ति वह लउका लडका का भाई होता है जल उठाकर एक दूसरे के यहां श्‍ाादी की बात पक्‍की करने का संकल्‍प लेता हे. और लडके पक्ष से कांगज पर मिथ्लिाक्ष्‍ार में विवाह की बात पक्‍की कर लेने की लिखित दस्‍तावेज सौंपते हैं. अपस में चाय पान बाटने के बाद दोनों पक्ष विवाह की तैयारी में जुट जाते हैं;

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