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    बुधवार, 27 नवंबर 2013

    नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री के रूप में आठ वर्ष पूरे कर लेने पर उनसे अंतरंग बातचीत

    Publish date : 27-11-2013
    सरकार के आठ साल, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार  से राज्य ब्यूरो प्रमुख मिथिलेश की खास बातचीत
    शासन के आठ वर्ष के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अकेले हैं.  24 नवंबर, 2005 को गांधी मैदान में हजारों लोगों की मौजूदगी में उनके साथ खड़े भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी  अब साथ नहीं हैं. आठ वर्षाें में शासन प्रशासन तो पटरी पर आया लेकिन, राजनीति के मसले पर कई उतार चढाव भी आये. अब भाजपा और जदयू के रास्ते अलग हो चुके हैं.  रिपोर्ट कार्ड जारी करने  के एक दिन पूर्व मुख्यमंत्री ने प्रभात खबर से अपने अनुभवों को खुल कर साझा किया. विपक्ष का हमला और साथियोंे के बगावती तेवर ङोल रहे मुख्यमंत्री  पहले दिन की तरह  अपने शासन-प्रशासन के एजेंडे के प्रति बिलकुल अडिग दिखे. जनता के प्रति कमिटमेंट में कोई कमी नहीं होने देने की बात कही. लड़कियों को साइकिल देने की योजना का जिक्र आया तो वे एक पल रूके और बड़े ही शांत भाव से कहा-इस योजना ने मुङो बहुत ही सकुन दिया है. बातचीत के सिलसिले में उन्होंने अपनी दैनिक रूटीन की भी चर्चा की. सुबह की सैर और थोड़ी देर की योगासन के बाद मुख्यमंत्री का कामकाज आरंभ हो जाता है. बमुश्किल,  पांच-छह घंटे की नींद के लिए समय निकल पाता है.




    राजनीति में कल की चिंता नहीं, चिंता की तो कुछ नहीं कर पायेंगे

    , पटना

    सवाल : आठ साल की सरकार के बाद  सरकार के समक्ष एक नयी चुनौती आतंकवाद की दिखती है. आप इसे किस प्रकार देखते हैं.
    सीएम : पहले  बिहार में इस तरह की कोई चुनौती नहीं थी. इन बातों को लेकर कोई दिलचस्पी भी नहीं थी. इन विषयो ंपर ज्यादा चर्चा भी नहीं होता था. एक खबर के रूप  में इसे देखते थे. यहां की मूल समस्या अपराध  और सामाजिक तनाव था.  कुल मिला कर कहिए कि एक ओवर आल अनसेफ  फिलींग थी. नक्सल समस्या यहां प्रारंभ से रही है. नक्सलबाड़ी में जब आांदोलन शुरू हुआ इसके तुरत बाद बिहार में भी आंदोलन दिखने लगा. यह आतंकी वारदात तो कुछ होता नहीं था. हाल में घटित दो घटना  से यह फोकस में आया. हमलोगों के लिए भी चुनौती  सामने आया है. एंटी टेररिस्ट स्कवायड एटीएस बनाने का मैने पूर्व में ही फैसला  लिया था. खुफिया तंत्र को मजबूत करने के उपाय का निर्णय लिया गया था. लेकिन, हाल में कुछ घटनाएं हुई. सोचने के लिए मजबूर कर दिया. जो भी गंभीरतापूर्वक तैयारी होनी चाहिए, वह की जा रही है. नक्सल को लेकर भी हम पर आरोप लग रहा है. घटनाएं तो बढती घटती रहती है. समस्या को संपूर्ण रूप से समझने की जरूरत है और उसका मुकाबला करना चाहिए. विकास के अछूते इलाके में , समूह में पांव फैलाने में यह ग्रुप सफल होने की कोशिश कर रहा है. हमारी सरकार ने इस पर फोकस किया. आपकी सरकार- आपके द्बार’ योजना आरंभ की गयी. इसका अच्छा लाभ मिला. लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उन्हें भागीदारी मिली. महिलाओं और अति पिछड़ी जातियों को पंचायती राज संस्थाओं में पचास फीसदी आरक्षण का लाभ दिया गया.बड़ी संख्या में  अभिवंचित वर्ग को  मौका मिला.इससे उनका झुकाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया  की ओर हुआ. इंटेलिजेंस ब्यूरो ने सूचना भी उपलब्ध कराये. इन सबको मिला कर ऐसी समस्याओं का समाधान निकाला जा रहा है. आपरेशन तो पुलिस  करती है. कहीं सर्च हो रही है तो कहीं पकड़ने की  कार्रवाई भी चल रही. कल जहां दुर्गम इलाका माना जाता था, वहां भी पुलिस- प्रशासन की उपस्थिति दर्ज हुई है. इन जगहो ंपर पुलिस वाले भी नहीं जाते थे. बहुत लोग मुख्य धारा में आये. जहां काडर बनाये जाते थे, वहां गुजाइश घटी है. यह अकेले बिहार की समस्या नहीं है, अनेक राज् यों की समस्या है. हमने बराबर केंद्र  का ध्यान आकृष्ट कराया. कारगर उपाय करने की  मांग की.उग्रवाद से प्रभावित इलाकों के लिए कई सुझाव दिये, लेकिन हमारे सुझावों पर पूरी तरह गौर नहीं किया गया.केंद्र ने शिक्षा, स्वास्थय, कृषि आधारभूत संरचना आदि के क्षेत्र में  काम  आरंभ किये जा रहे हैं, इसका लाभ भी दिख रहा है. केंद्र ने हमारी बाते ंस्वीकार नहीं कि लेकिन हमारे प्रस्ताव से उन्हें एक दिशा मिली. उन्होंने इंट्रीग्रेटेड एक्शन प्लान बनाया. जिला को आधार  बनाया गया, जिसमें डीएम, एसपी और वन पदाधिकारी की कमेटी गठित की है.एक कदम आगे बढे हैं. बिहार के 11 जिले शामिल किये गये. हम बाकी के जिले को इस योजना का लाभ दिलाना चाहते हैं. प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना जिसमें दो सौ पचास की आबादी वाले टोले तक सड़क पहुंचाने की तर्ज पर मुख्यमंत्री ग्राम संपर्क योजना
     आरंभ  की गयी है. हमारे प्रस्ताव को पूर्ण रूप से स्वीकार करते तो ज्यादा बेहतर होता. शुरूआत हुई है.घटनाए घटी है. हम सजग, सक्रिय और सतर्क होकर इसका मुकाबला करेंगे.  सबसे बड़ी बात पहले ऐसी परिस्थितियां सामने नहीं आयी थीं. कोई सोचता भी नहीं था कि बोध गया में बम विस्फोट हो सकता है. हम गये. सुरक्षा के इंतजामात किये गये. अब जाकर देखिए, काफी अचूक व्यवस्था हो रही है. निरंतर सतर्कता की स्थिति है. हमारे अफसर को सतर्कमता का इनपुट नहीं था. अब सारा उदभेदन हो चुका है. यहां से जो क्लू मिला उसी से बोध गया की गुत्थी भी सुलझ गयी. एनआइए ही सक्षम संस्थान है, जिनके पास पूरा ससंसाधन है इस तरह की घटनाओं से निबटने और उदभेदन के. अब हम लोग भी धीरे-धीरे करेंगे.
    सिमी के बारे में
    छत्त्ीासगढ में बहुत लोग छिपे हुए थे. बहुत कुछ सार्वजनिक किया. इससे स्लीप कर गया. आपको जानकारी मिल गयी तो आपरेट करना चाहिए था. पर, एक्सपोज पहले  कर दिया जिससे आपरेशन नाकाबिल हो गया. यह सोचने की बात है. जो तरीके हैं, वह कहां तक कारगर है.पब्लिक डिबेट से तो सुलङोगा नहीं. नेटवर्क खोजना होगा. उनके खिलाफ ऐसा वातावरण तैयार करना होगा जिससे उनकी दाल नहीं गले. यह काम पुलिस ही करेगी. पटना जंक्शन के बाहर जो वारदात हुई और उसमें एक पकड़ा गया, उसी से तो सब पकड़े गये. और, मालूम पड़ा कि और भी जगह ब्लास्ट होना है. एक सुराग मिला तो बहुत से लोग पकड़े गये. इसमें तो बिहार पुलिस की प्रशंसा होनी चाहिए थी. लेकिन, शिकायत करने लगे. हम सबको दूसरे का काम की खिचाई कररने में आनंद आता है.  सरकार के पास जो पालिसी थी उससे पुलिस को मदद की गयी, मामला  एंटी नक्सल की हो या एंटी टेररिज्म की. लेकिन, यहां सब लोग इनवेस्टिगेशन के ही एक्सपर्ट बन जाते हैं. जो कुछ हुआ हमने कहा- यदि कोई कमी है तो हम स्वीकारते हैं. एटीएस भी बन गया. कैबिनेट का यह फैसला है. पुलिस को काम करना है. मंजूरी दे दी गयी है. साधन से, इंस्ट्रक्शन से सहयोग दे रहे  हैं. ‘ तजुर्बे की कमी थी, अब तो हो गया है. हर चीज में आगे बढेंगे’. मैं इस विवाद में नहीं पड़ाAा चाहता हूं. मंच तक , बांस बल्ला तक और यहां तक  कि इन्कलोजर में कोई घटना नहीं घटी. इसलिए सब चीजों का प्रोटोकाल पहले ही बना दिया. सबकी जांच होगी. यहां तो लोकतांत्रिक मानस है. लोगों को खराब भी लग सकता है. लेकिन अब तो सुरक्षा को  लेकर ऐसा करना ही होगा. जनता के दरबार में एक लड़की ब्लेड लेकर अंदर आ गयी और अपने हाथ को काटने की कोशिश करने लगी. उसे बचाने में एक इंस्पेक्टर का भी हाथ कट गया. एक महिला किरासन तेल लेकर आ गयी और आग लगाने लगी. इसलिए अब जांच जरूरी है.‘अपना अनुभव बताते हैं’संसद भवन जाते थे तो पहले बसें चलती थी अंदर. कभी टैक्सी से पोर्टिको में उतरते थे. धीरे-धीरे सुरक्षा बढी. अब सुरक्षा के मददेनजर यह संभव नहीं है. यहां भी धीरे-धीरे यह सब लागू होगा.  यह तो अनुभव की बात है. गांधी मैदान में जितना पालिथिन बिखड़ा पड़ा था, उसी में बम छिपा दिया. इसलिए अब तो देखना पड़ेगा कि गंदगी क्लीन हुई या नहीं, बम को कोई जमीन में ही नहीं तो गार दिया. यह ऐसी चीज है जिस पर सबको मिल कर सोचना चाहिए. लेकिन इस पर विवाद खड़ा किया जा रहा है. ‘ सारे आरोप हम पर लगाये जा रहे हैं. हमको हैंग कर दीजिए, समस्या से मुक्त हो जायेंगे’.अहमदाबाद में 2008 में ब्लास्ट हुआ,  इस पर कोई नहीं बोल रहे. हम तो स्वीकार कर रहे हैं. झूठी बातों को लेकर विवाद पैदा किया जा रहा है. जबकि  ‘डे-फस्र्ट से’ पहले दिन से कहा जा रहा है. हमने खुद ही कहा था-सैनिटाइज करिये. दिन में भीड़ में आ कर बम रख दिया.अब पूररी फ्रिसकिंग की जरूरत है. दिल्ली मे ंहोती है तो किसी को ऐतराज नहीं. यहां भी मानसिकता बनानी होगी. ब्लास्ट  से बचाव के लिए जिस प्रकार इंतजाम होता है वहां, यहां भी करना होगा.  एक चुनौती यह भी है. भाकपा माले की सभा थी. कितने लोगों को लगाया जाता. अंतिम समय में जगह बदला. बिहार इन सब चीजों में सक्रिय प्रदेश है.
     गांधी मैदान की जीर्णाेद्बार के लिए जब जब टाइम लेते हैं, किसी पार्टी ने कह दिया रैली हम यहीं करेंगे.  नहीं मिले तो गाली हमही पर देना शुरू हो जाता है. अरे, यह तो पूरी तरह डीएम का मामला है. वही फाइनल अथारिटी है. लेकिन, यहां तो आदत है, मुङो तानाशाह बना देते हैं. प्रोटाकाल लागू होगा तो सबको समझना होगा. दुकाने हटी तो इसका भी विरोध शुरू हो जाता है.

    ‘ हमारा अपना तजुर्बा है. जब सांसद और विधायक नहीं थे, 1980 और 1981 में दिल्ली गये. तीनमूर्ति भवन के पास जूस पी रहे थे, सामने से इंदिरा गांधी तब प्रधानमंत्री थीं, तीन-चार गाड़ियों क ेकाफिले में वह निकलतीं. यह अब असंभव है.’ रातो रात नहीं होगा लेकिन, प्रयास आरंभ हो गया है.



    सवाल : आपने नयी योजना लड़कियों को छात्रवृति देने की घोषणा की है.
    सीएम : हमने  इस योजना को इस वर्ष 15 अगस्त को घोषणा किया है. कक्षा एक से 10 तक की सभी कटेगरी की छात्रओं को छात्रवृति दी जायेगी. इसके लिए 1121 करोड़ रुपये मंजूर किये गये हैं. शौचालय की योजना भी इसी प्रकार की है. अब तो मनरेगा का पैसा आ गया है. निर्मल भारत योजना का पैसा है. इससे बेस्ट शौचालय बन सकता है. इसमें सभी तबके के लोग शामिल हैं. बीपीएल और एपीएल भी.  केंद्र ने भी स्वीकार कर लिया है. शौचालय विहीन परिवार हमारे टारगेट में है.  बिहार के लिए पूराने सर्वे के आधार पर केंद्र के अलग आंकड़े हैं. हमने सर्वे करवाया है, इसमें 2.19 करोड़ परिवार हैं. हमने 2007 से ही प्रयास आरंभ कर दिया है. लोहिया स्वच्छतायोजनाभीहै.

    सवाल : आठ साल का अनुभ क्या रहा.सबसे बड़ी चुनौती क्या दिखी.
    सीएम: यहां सबसे बड़ी चुनौती गवर्नेंस नहीं एबसेंस आफ गवर्नेंस थी. गवर्नेंस तो थी ही नहीं.विकास के काम भी हुए और गवर्नेंस की स्थापना की प्रक्रिया भी चली. सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत संरचना आदि आदि. बिजली भी चुनौती थी. हमलोगों ने प्रयास किया. छठ के समय 23 सौ मेगावाट बिजली मिलना क्वांटम जंप था. तीन हजार मेगावाट  बिजली अभी मिल रही है. अगले साल चार हजार मेगावाट तक ले जाना है.  बहुत बड़ा काम है. हर दिन इस पर नजर रखी जास रही है. अपनी हो या सेंट्रल सेकटर से, बाजार से बिजली उपलब्ध होगी. शिक्षा भी बहुत जरूरी था. बजट का 23 प्रतिशत राशि इस पर खर्च की जा रही है.  अकेले शिक्षा से बहुत सारी समस्याओं का समाधान निकल आता है.  फर्टिलिटी रेट में सुधार आया है. लड़कियां पढी तो इसमें व्यापक सुधार आता है. लड़कियां प्लस टू तक पढी तो 1.6 प्रतिशत तक शिशु प्रजनन दर में सुधार आया. इसलिए हमने तय किया कि सबको प्लस टू तक शिक्षा उपलब्ध करा दें.  इसके लिए पंचायतों में एक हजार स्कूल खोले जाने का निर्णय लिया गया है. इसमें आठ सौ की पहचान हो गयी है. स्कूलों में शौचालय बनाये जा रहे हैं.  जहां जगह की कमी है, वहां पहले तल्ले पर इसकी जगह तय की गयी है.  स्कूलों में शौचालय के साथ पीने के पानी की व्यवस्था की गयी है. फोकस इसी पर है.

    महिलाओं का स्वावलंबी होना समाज को बदल देगा
    अब अलग से लड़कियों के लिए स्कूल नहीं खोले जा रहे. को-एड स्कूल का कंसेप्ट है. लड़के-लड़कियों के एक साथ पढने से माहौल बेहतर होता है. इसलिए जो भी स्कूल खुल रहा है, को-एड खुल रहा है. अपर प्राइमरी स्कूल में तो लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक है. जेंडर गैप खत्म हो रहा है. हाइ स्कूल में लड़के और लड़कियों का अनुपात 56:44 का है. बहुत कम समय में यह अंतर भी खत्म हो जायेगा.  मिडिल कक्षाओं में लड़कियों  की संख्या बढने का सबसे बड़ा कारण पोशाक और साइकिल योजना है. जिलों में यात्र के दौरान हमने यह पाया कि पोशाक नहीं होने के कारण लड़कियां आगे की पढाई नहीं कर पाती थी. इसलिए पोशाक योजना आरंभ किया. इसका दूरगामी प्रभाव पड़ा. हमारे यहां आबादी स्थिरीकरण की बहुत सारी योजनाएं चली. लेकिन, किसी का खास लाभ नहीं हुआ.एक मात्र शिक्षा से ही यह होगा. बाल विवाह, भ्रूण हत्या, तिलक-दहेज सभी  समस्याओं का समाधान इसी में निहित है. लड़की पढेगी तो बाल विवाह नहीं करेगी. भ्रूण हत्या नहीं होने देगी. सबको कम से कम प्लस टू तक की शिक्षा होगी और इस संसाधन का उपयोग स्वयं सहायता समूह बनाकर किया जायेगा.  इसलिए हमारी सरकार ने बड़ी  संख्या में  स्वयं सहायता समूह गठित करने का फैसला लिया है. सवा करोड़ महिलाएं स्वयं सहायता समूह से जुड़ेंगी. सवा करोड़ महिलायें यानि छह करोड़ लोग. यह सोशल चेंज ला देगा. सामाजिक बदलाव होगा.  स्वयं सहायता समूह की आर्थिक ताकत बढायी जायेगी. अभी सात प्रतिशत पर ऋण देने की केंद्र चला रही है. केंद्र ने कहा आइआरपी योजना के तहत 11 जिलों में चार प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध करायेंगे. हमने बाकी के 27 जिलों में राज्य के बलबुते इस योजना को लागू करने का फैसला लिया है.  जो भी 100-200 करोड़ लगेगा हम देंगे. सेल्फ हेल्प ग्रुप का यह मेरा माडल थोड़ा डिफरेंट है. मुर्गी पालन और बकरी पालन भी इस योजना में शामिल होगा. राज्य की योजनाओं से सेल्फ हेल्प ग्रुप को लिंक कर देंगे. एक हिस्सा कंप्यूटर में पारंगत है. दूसरे को भी वहां  तक पहुंचायेंगे. अवेयरनेस से यह सब होगा. जागरूकता लानी होगी. पांच साल बाद दिखेगा इसका लाभ.  यहां का गांव  बदल जायेगा, पहचान में नहीं आयेगा. यह सब होगा डिजिटल डिवाइस से. टीकाकरण में हम टाप-5 में आयेंगे.  फोकस  एप्रोच अभी प्रारंभिक अवस्था में है. गांव की महिलाओं को साक्षरता के लिए अक्षर आंचल योजना से जोड़ रहे हैं. जो बच्चे स्कूल नहीं जा पाये उसके लिए टोला सेवकों क ो रखा. केंद्र ने सहयोग देना बंद कर दिया. हमने अपनी स्कीम बनायी. टोला सेवकों को काम दिया-बच्चों को स्कूल ले जायेंगे. माता को साक्षर बनायेंगे. टोला सेवक का काम बढ गया. अल्प संख्यक  टोलों में तालिमी मरकज के वोलेंटियर को काम सौपे गये. उन्हें निरक्षर महिलाओं को साक्षर बनाने का काम दिया गया है. महिला साक्षरता में दशकीय वृद्बि दर सबसे ज्यादा बिहार मे ंही है. लेकिन, ओवरआल में बिहार  पीछे है.   हमारा लक्ष्य है, 2021 में महिला साक्षरता में बिहार टाप-10 में एक हो.टेबलेट बाटने की योजना पर अभी विचार चल रहा है. यह डिस्कस  के लेवल पर है. हम मंथन कर रहे हैं. अभी बाट देने से  आठ हजार टेबलेट अनुपयोगी हो जायेगा. चीजें बदल जायेंगी, तब इस योजना को लागू किया जायेगा. तभी इसका फलाफल भी दिखेगा.  हमलोगों ने असंगठित मजदूरों के लिए कई योजना लायी है.महिला मजदूरों को भी साइकिल देने जा रहे हैं. योजना शुरू हो गयी है. टूल्स भी उपलब्ध करायेंगे. एक फंड क्रिएट किया जा रहा है. सरकारी और गैर सरकारी जितने भी निर्माण होंगे , सबसे लेवी के रूप मे ंएक रकम ली जायेगी. प्रारंभिक रूप में तीन सौ करोड़ रपुये की आवश्यकता है. इस पैसे से मजदूरों के बच्चों को छात्रवृति दी जायेगी. घर बनाने के लिए 10 से 15 हजार रुपये तक की मदद करेंगे. इसके लिए जरूरत है रजिस्ट्रेशन की. इसके लिए प्रचार प्रसार कराये जा रहे हैं. हर दिन फंड में पैसा जा रहा है. इस पैसे का प्रोपर मैनेजमेंट किया जा रहा है.
    सवाल : आठ साल में राजनीतिक चुनौतियां क्या रही और किस प्रकार इसका सामना किया.
    सीएम :  यह इस बात पर निर्भर करता है कि  आप किस रूप में इसे लेते हैं. यह आप पर निर्भर करता है. यह तो प्रोफेशनल हेजार्ड है. साथ-साथ काम करने से समस्याएं तो आती ही है. लेकिन, ओवर आल जनता के प्रति कमिटमेंट है. रही बात पालिटिकल मैनेजमेंट की तो यह भी गवर्नेंस के साथ-साथ चलता है. दोनों काम साथ-साथ.यह संभव नहीं कि गवर्नेस पर बात हो और पालिटिकल कमिटमेंट को पूरा नहीं करें. सरकार चलाने का मौका मिला है तो दोनों चीजें साथ-साथ चलती रहे.ऐसा ही साढे सात सालों में हुआ. दोनों काम साथ-साथ किये गये. विवाद भी गाहे-बगाहे होता रहा. बात कभी सार्वजनिक रूप से आयी भी, नहीं भी आयी. नहीं भी आयी, फिर भी जो काम करता है उसे ऐसी समस्याओं से जुझना तो पड़ता ही है.
    सवाल : साढे सात साल की एनडीए सरकार और  पांच महीने की जदयू की सरकार, आपको किसमें सहुलियत दिखी.
    सीएम:  हमारे लिए कोई फर्क नहीं पड़ा. गधा के उपर जैसे छह मन उसी तरह नौ मन. कोई फर्क नहीं पड़ता.  काम के घंटे नहीं बदले. जिस दिन से काम शुरू किया आज तक वहीं कर रहा हूं. पहले भी कोताही नहीं करता था, आज भी नहीं करता हूं. अब तो कुछ काम बढ ही गया है. एक ऐसी नौबत आयी, जिससे अलग होना पड़ा. यह अचानक नहीं आयी. दोनों पार्टियों के पता था. एक पक्ष था जो उत्त्तेजना फैला रहा था. उन्हें  अब सत्ता जाने का मलाल है.   हमारे पास बहुत कम काम पेंडिंग रहता है. दूसरे राज्यों में देख लें. गुजरात को ही लें. वहां कितना काम होता है. मेरे पास कोई डिस्कशन, कोई निर्णय और कोई संचिका पेंडिंग नहीं रहती. 16 घंटे हो या 18 घंटे, काम के घंटे मैने निर्धारित नहीं किया है. तनाव में काम नहींे करता, काम में मन लगता है. काम को जब बोझ समङोंगे, तभी परेशानी होगी. किसी ने कहा तो नहीं है कि काम करिये. स्वयं का लिया हुआ काम है. जनता से मैनडेट मांग कर लिया  हुआ काम है. स्व विवेक और स्व इच्छा से. इसलिए इसे बोझ नहीं समझता. हां, कभी-कभी दु:ख होता है. साथ रहने वाले भी अनाप-शनाप बोलते हैं.यह छह महीने में बढा है. धीरे- धीरे अनुभव हो गया है.  राजनीति में कल की चिंता नहीं करते. कल की चिंता आपने की तो कुछ नहीं कर पायेंगे. हम आने वाली पीढी की चिंता करते हैं. जब जीवन ही नश्वर है तो कुरसी की चिंता काहे की.
    सवाल : कोई ऐसा निर्णय जो लगता हो, नहीं लेना चाहिए था.
    सीएम : ऐसा कुछ याद नहीं आ रहा. आपको याद हो तो बताइये. देखिए, डिसिजन लेना तो जरूरी है.  आप निर्णय लेंगे तभी तो इसके सही -गलत का अंदाजा लग सकता है. कभी-कभी हो सकता है कि कोई निर्णय लेना सही नहीं रहा हो. या, उस लेवल तक नहीं गया हो.

    सवाल : आठ वर्षाें में सबसे महत्वपूर्ण काम जिससे दिल का सकुन पहुंचा हो.
    सीएम : लड़कियों को साइकिल देने की योजना. यह ऐसी योजना है जिससे मुङो , मेरे दिल को बहुत ही सकुल मिला. लड़कियों को साइकिल पर चए कर स्कूल आते-जाते जब भी नजर पड़ती है, दिल को बहुत चैन मिलता है.  यह स्कीम क्लिक कर गयी.  इसकी शुरूआत भी रोचक तरीके से हुआ. ओवरआल शिक्षा को लेकर पहले से मन में कई ख्याल थे. 2007 की बात है. हमने देखा, पटना में ही. बी राजेंद्र कलेक्टर थे. केंद्र की एक योजना से डेढ सौ अनुसूचित जाति की लड़कियों को साइकिल देने की योजना का शुभारंभ करने गया था. उसी समय मेरे मन में सभी लड़कियों को साइकिल देने का ख्याल आया था. बाहर निकला और जब साइकिल पर चढ कर लड़कियों को जाते देखा तो मन में निश्चय कर लिया. भारतीय नृत्य कला मंदिर से जब तक मै 1, अणो मार्ग पहुंचता, आवास पर सब अधिकारियों को बुला चुका था.  मदन मोहन झा उस समय शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव थे. उनसे मेरा अलग रिश्ता था. वह मेरे कालेज में साथ थे, हास्टल में साथ थे. हमने अपनी योजना बतलायी तो सबने उसी ठीक कहा. असहमति एक बात को लेकर थी.  अधिकारी चाहते थे, साइकिल पर सरकार का लोगो लगे. मैं अकेला था जो कह रहा था- कि साइकिल खरीद सरकार के सतर पर नहीं होना चाहिए. यह बात समझाने में मुङो तीन महीने लग गये. आखिरकार मेरी बातों से सब सहमत हुए. अधिकारियों ने टेंडर जारी कर दिया था. मुङो केंद्र में कृषि मंत्रित्व काल का एक वाकया याद था. पेस्टिसाइट से जुड़ा मामला था. मैने अधिकारियों से कहा- आप साइकिल खरीदेंगे,  इसमें भ्रष्टाचार रोक नहीं पायेंगे. क्या पता टेंडर मिल जाने के बाद चयनित कपंनी ही  क्वालिटी में अंतर कर दे. पहले स्पोक टूटेगा और बाद मे ंचक्का. जहां जायेंगे एक नयी समस्या खड़ी होगी. मैने रास्ता निकाला. अघिकारियों ने मुङो बताया था कि लोएस्ट टेंडर 18 सौ रुपये का आया है. हमने इस आधार पर दो हजार रुपये साइकिल के लिए मंजूर कर दिये. इस पैसे से साइकिल के अन्य जरूरी पार्ट भी उपलब्ध हो जाते. इस निर्णय के दूरगामी परिणाम आये. गांव-गांव में इसका नतीजा सकारात्म निकला. जो लोग मेरे विपक्ष में बोलते हैं, उसकी जड़ में यही चीज है.    दो-तीन साल के बाद लड़कों के लिए भी साइकिल योजना लागू कर दिया.  साइकिल योजना से लड़किययों में कंफिडेंस बढा.

    सवाल : सड़क और पुल के मामले में भी अनेक काम हुए,  अब आपकी प्राथमिकी क्या है.
    सीएम : सड़कों के मामले में कई निर्णय लिये गये. हमने  किशनगंज से छह घंटे में राजधानी पहुंचने का लक्ष्य रखा था. अब वह भी पूरा हो गया है. अब नये लक्ष्य निर्धारित करेंगे. बलुआहा नदी पर बन रहे पुल का हम 14 दिसंबर को उदघाटन करने जा रहे हैं.  रतवलपुर पुल का 26 नवंबर को उदघाटन होगा. 21 जनवररी 2009 को इसकी आधारशि रखी थी. विजयघाट पुल का उदघाटन 14 जनवरी, 2015 को करेंगे. भागलपुर जिले के सुलतानगंज में  17 सौ करोड़ की लागत से पुल बन रहा है.  नौागछिया पुल की मरम्मत की योजना बन रही है. कमलाघाट पनर पांच से छह टोटे-छोटे पुल बनेंगे. सिमरी बक्तियारपुर से लिंक हो जायेगा. खगड़िया से सहरसा एक से डेढ घंटे में, एक पैरिलल रूट बनाया है. सब पर काम हो रहा है. दरभंगा अब भागलपुर से भी जुड़ जायेगा. विजयघाट पुल का दोनों इंड तो भागलपुर में ही है.  इससे मधेपुरा से भागलपुर की दूरी 10 से 12 किलोमीटर  रह जायेगी.

    सवाल :शहरों के विकास के लिए कोई योजना बन रही है क्या.
    सीएम : शहरों के लिए भी कई योजनाएं है. लेकिन, यहां सबसे बड़ी समस्या है अवेयरनेस की. अहंकार ज्यादा है कत्र्तव्य कम. लोग राइट कंशस तो हैं, डयूटी कंशस नहीं. शहरी निकायों का माइंडसेट नहीं बदल पाया है. नगर निगम इसके लिए तैयार नहीं है. हम जो भी योजना बनायेंगे उसका इम्पलीमेंट नगर निगम को ही करना है. माइंडसेट नहीं होने की वजह से काम आगे नहीं बढ पा रहा. कारण है, बिहार में कभी सामाजिक आंदोलन नहीं हुए. दक्षिण के राज्यों में ऐसे आंदोलन हुए और देखिए इसका असर भी है. यहां भी ऐसा आंदोलन हुआ होता तो सुधार दिखता. जय प्रकाश नारायण ने भी अपनी बहंगी  पर पानी ढोया था तभी जाकर केंद्र खोले. यह कोई सोचे   कि गवर्नेंस से ही सब कुछ हो जायेगा तो यह संभव नहीं है.

    सवाल : बड़े निवेश नहीं हो पाये हैं.
    सीएम : बड़ा निवेश तभी होगा जब बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिल जायेगा. हम निवेशकों को राज्य की करों में छूट तो दे सकते हैं. लेकिन, केंद्रीय करों में रियायत विशेष राज्य का दर्जा मिलने के बाद ही हो पायेगा.  बिहार बहुत बड़ा बाजार है. दर्जा मिलने पर यहां निवेशकों को हर तरह  की छूट मिलेगी. अब तो रास्ता खुल ही गया है. रघुराम राजन कमेटी ने गुंजाइश निकाल दी है. अब फैसला केंद्र को लेना है. कल तक कें्र कह रहा था क्राइटेरिया में बिहार फिट नहीं बैइता. अब तो  रघुराम राजन  कमेटी ने रास्ता बना दिया है. केंद्र इस पर निर्णय ले. बिहार का भला होगा. निवेश क ेरास्ते खुलेंगे, रोजी-रोजगार का अवसर खुन जायेगा. राज्य की आर्थिक ताकत बढेगी, विकास के नये कार्य होंगे.

    सवाल : हाल के दिनों में पीएम आन वेटिंग के आये कंसेप्ट से आप कितने सहमत हैं.
    सीएम : देखिए, वोट तो नीतियों पर मिलता है. चेहरे पर वोटिंग नहीं होती. रही बात प्रधानमंत्री पद के लिए तो जिनका संसद में बहुमत होगा, प्रधानमंत्री पदतो उसी को मिलेगा. अब तो नीतियां गौण  हो गयी है, तथ्य भी गौण हो गये हैं. यह सब देख- सुन  कर खराब लगता है. अब तो बापू के नाम भी बदले जा रहे हैं. यह बहस राजगीर सम्मेलन से निकली है. इतिहास और भूगोल सब गड़बड़.



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